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राम जन्म भूमि का ताला खोलने का आदेश देने वाले जज K M PANDEY के साथ क्या हुआ

न्यायमूर्ति के एम पांडे को मिली राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने की सजा...!
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कांग्रेसी कुत्ते झूठ बोलते हैं राम जन्मभूमि का ताला राजीव गांधी ने खुलवाया ... यह महज एक संयोग था जब राम जन्मभूमि का ताला खोलने का आदेश फैजाबाद के जिला न्यायाधीश केएम पांडे ने दिया उस समय राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे ... राजीव गांधी ने उस समय इलाहाबाद हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के जरिए जस्टिस केएम पांडे को मैसेज दिया था कि आप ताला खोलने का आदेश मत दीजिएगा

और राम जन्मभूमि का ताला खोलने का आदेश देने वाले जस्टिस केएम पांडेय का कैरियर बर्बाद कर दिया गया

अयोध्या के इतिहास को देखें तो आजादी के बाद तीन अहम पड़ाव हैं. पहला, 1949 जब विवादित स्थल पर मूर्तियां रखी गईं, दूसरा, 1986 जब विवादित स्थल का ताला खोला गया और तीसरा 1992 जब विवादित स्थल गिरा दिया गया. 1992 के बाद की कहानी सबको पता है, लेकिन 1949 से लेकर अब तक ऐसा काफी कुछ हुआ है जो आपको जानना चाहिए.

एक उदास बन्दर को देखकर केएम पांडे को दुःख हुआ और उन्होंने राम जन्मभूमि का ताला खोलने का आदेश देने का निर्णय किया

साल 1986. फैजाबाद जिला न्यायालय के  जज के.एम. पांडे अयोध्या में घूम रहे थे ..उन्होंने एक बंदर को एक झंडा थामे देखा. लोग बंदर को मूंगफली और फल दे रहे थे. जज पांडे ने सोचा कि ये अजीब बात है कि बंदर इन्हें खाने से मना कर रहा है. उन्होंने पुजारी से इसका कारण पूछा तो पुजारी ने कहा साहेब जिसका भगवान तालों के कैदखाने में बंद हो उसे कुछ खाने की इच्छा कैसे होगी ..

इसके बाद वो अपने चैंबर में गए जहां उन्हें बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने की याचिका पर सुनवाई करनी थी. केंद्र और राज्य की कांग्रेस सरकार के दो अफसरों ने कोर्ट को कहा कि अगर बाबरी मस्जिद के ताले खोल दिए जाएंगे तो कानून व्यवस्था बिगड़ेगी. केंद्र में राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और यूपी में नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री थे ...यानी कांग्रेस और राजीव गांधी नही चाहते थे कि राम जन्मभूमि का ताला खुले

लेकिन जज पांडे ने अपने फैसले में कहा कि अगर हिंदू श्रद्धालुओं को परिसर के अंदर रखी मूर्तियों को देखने और पूजने की इजाजत दी जाती है तो इससे मुस्लिम समुदाय को ठेस नहीं पहुंचेगी, और न ही इससे आसमान टूट पड़ेगा.

अयोध्या में विवादित स्थल का फैसला देने के करीब 6 महीने बाद फैजाबाद के तत्कालीन जिला जज के एम पांडे को यह एहसास होने लगा था कि आखिर क्यों पिछले कई जिला जज इस मामले पर फैसला देने से बचते रहे.

पांडे जी के हाईकोर्ट जज के प्रमोशन की फाइल इधर से उधर धूल फांकने लगी. कोई भी ये बताने को तैयार नहीं था कि आखिर उनका प्रमोशन कब होगा और यह क्यों नहीं हो रहा है. फाइल तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यलाय में सालों तक धूल फांकती रही. अपनी किताब VOICE OF CONSCEINCE में जस्टिस पांडे ने लिखा है कि 1987 में कई जजों के नाम के साथ उनके नाम को भी हाईकोर्ट जज बनाने की सिफारिश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने की, लेकिन 5 दिसंबर 1989 तक सीएम रहे नारायण दत्त तिवारी ने उनके नाम की सिफारिश केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को नहीं भेजी.

करीब-करीब तीन साल तक जिला जज के एम पांडे की फाइल राज्य सरकार के लॉ विभाग और मुख्यमंत्री कार्यायल में धूल फांकती रही और उस पर कोई फैसला नहीं लिया गया. जिला जज के एम पांडे के साथ काम करने वाले तत्कालीन सीजेएम सी डी राय बताते हैं कि इतने सालों तक फाइल दबी रहने के बाद पांडे जी परेशान रहने लगे उन्हें लगने लगा कि उनका करियर खत्म हो गया.

5 दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद जस्टिस पांडे को लगा कि अब शायद उनकी फाइल आगे बढ़ जाएगी, लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा. कुछ दिनों बाद उनकी फाइल को रिजेक्ट कर दिया गया. यानी जो उम्मीद बची थी वो भी खत्म हो गई. सी डी राय बताते हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने विवादित स्थल का ताला खुलवाने की सजा जिला जज पांडे की दी.

के एम पांडे ने अपनी किताब में उस समय के समाचार पत्रों के हवाले से लिखा है कि मुलायम सिंह यादव ने उनकी फाइल रिजेक्ट करते हुए लिखा, “श्री पांडे एक सुलझे हुए, कर्मठ, योग्य और ईमानदार न्यायधीश हैं, लेकिन 1986 में बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर इन्होंने एक साम्प्रदायिक तनाव पैदा कर दिया. इसलिए मैं नहीं चाहता हूं कि इन्हें हाईकोर्ट का जज बनाया जाए."

केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की भेजी गई इस टिप्पणी के बाद फाइल वापस लौट आई और जिला जज के एम पांडे की हाईकोर्ट जज बनने की उम्मीद खत्म हो गई और वह जिला जज के पद से ही रिटायर हो गए.

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