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प्रेम ने दोनों को गले लगा दिया। यह बड़ी और घटना है।

आक्रामक प्रेम में डर है
कि कहीं कामवासना छिपी हो।
वास्तविक प्रेम तो प्रार्थनापूर्ण होता है,
वासनापूर्ण नहीं होता।

वास्तविक प्रेम को दूसरे को
गले लगाना जरूरी भी नहीं है।

वास्तविक प्रेम तो एक आशीर्वाद है।
तुम किसी के पास से गुजरे,
आशीर्वाद से भरे हुए गुजरे, काफी है।

आत्मा आत्मा को गले लग गयी,
शरीर को शरीर से लगाने से क्या प्रयोजन है!
कभी-कभी आत्मा के गले लगने के
साथ-साथ शरीर का गले लगना भी घट जाए,
तो शुभ है। लेकिन वह घटे, घटाया न जाए।

कभी ऐसा होगा कि तुम बड़े
आशीर्वाद से भरे हुए किसी के
पास से निकलते थे और
उसके हृदय में भी तुम्हारे आशीर्वाद की
तरंगें पहुंचीं और दोनों एक-साथ
किसी अनजानी शक्ति के वशीभूत होकर
एक-दूसरे के गले लग गये।

तो तुम गले लगे ऐसा नहीं,
दूसरा गले लगा ऐसा नहीं,
प्रेम ने दोनों को गले लगा दिया।
यह बड़ी और घटना है।

जब तुम लगते हो गले, तो वासना है।
तुम्हारी वासना के कारण दूसरा हटेगा।
कृपा करके ऐसा आक्रमण किसी पर मत करना।
तुम दूसरे को भयभीत कर दोगे।

वासना की आंख से देखा जाना किसी को भी पसंद नहीं।
प्रेम की आंख से देखा जाना सभी को पसंद है।
तो दोनों आंखों की परिभाषा समझ लो।

वासना का अर्थ है,
वासना की आंख का अर्थ है कि
तुम्हारी देह कुछ ऐसी है कि
मैं इसका उपयोग करना चाहूंगा।

प्रेम की आंख का अर्थ है,
तुम्हारा कोई उपयोग करने का सवाल नहीं,
तुम हो, इससे मैं आनंदित हूं।
तुम्हारा होना, अहोभाग्य है! बात खतम हो गयी।

प्रेम को कुछ लेना-देना नहीं है।
वासना कहती है, वासना की तृप्ति में और
तृप्ति के बाद सुख होगा;
प्रेम कहता है, प्रेम के होने में सुख हो गया।

इसलिए प्रेमी की कोई मांग नहीं है।
तब तो तुम अजनबी के पास से
भी प्रेम से भरे निकल सकते हो।
कुछ करने का सवाल ही नहीं है।

हड्डियों को हड्डियों से लगा लेने से कैसे प्रेम हो जाएगा! प्रेम तो दो आत्माओं का निकट होना है।
और कभी-कभी ऐसा हो सकता है
कि जिसके पास तुम वर्षों से रहे हो,
बिलकुल पास रहे हो, पास न होओ;

और कभी ऐसा भी हो सकता है
कि राह चलते किसी अजनबी के
साथ तत्क्षण संग हो जाए, मेल हो जाए,
कोई भीतर का संगीत बज उठे,
कोई वीणा कंपित हो उठे। बस काफी है।

उस क्षण परमात्मा को धन्यवाद देकर आगे बढ़ जाना। पीछे लौटकर भी देखने की प्रेम को जरूरत नहीं है।

पीछे लौट-लौटकर वासना देखती है।
और वासना चाहती है कि दूसरा मेरे अनुकूल चले।

 ओशो  जिनसूत्र

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