भ्रष्टाचार संस्कृत भाषा के दो शब्द “भ्रष्ट” और “आचार” से मिलकर बना है !!

भ्रष्टाचार संस्कृत भाषा के दो शब्द “भ्रष्ट” और “आचार” से मिलकर बना है। “भ्रष्ट” का अर्थ होता है - निम्न, गिरा हुआ, पतित, जिसमें अपने कर्त्तव्य को छोड़ दिया है तथा “आचार” शब्द का अर्थ होता है आचरण, चरित्र, चाल, चलन, व्यवहार आदि। अत: भ्रष्टाचार का अर्थ है - गिरा आचरण अथवा चरित्र और भ्रष्टाचारी का अर्थ होता है - ऐसा व्यक्ति जिसने अपने कर्तव्य की अवहेलना करके निजी स्वार्थ के लिये कुछ ऐसे कार्य किए हैं, जिनकी उससे अपेक्षा नहीं थी। 
भ्रष्ट आचरण, इसके अन्तर्गत वह सभी भ्रष्ट आचरण में आते हैं जो नैतिकता के विरुद्ध होते हैं, अर्थात् कोई भी ऐसा व्यवहार जो लोकाचार अथवा सदाचार के विपरीत है, वस्तुत: यह भ्रष्टाचार है। कदाचार, दुराचार, स्वेच्छाचार, मिथ्याचार, छल-छद्म, अत्याचार, अन्याय, पक्षपात, पाखण्ड, रिष्वतखोरी, कालाबाजारी, गबन, तस्करी, विष्वासघात, देषद्रोह, व्यभिचार, आदि सब भ्रष्टाचार के ही वंषज हैं। भ्रष्टाचार का स्तर और प्रकार परिस्थितियों अथवा संस्कृतियों पर निर्भर करता है। लेकिन बेईमानी स्वत: भ्रष्टाचार की मूल अवस्था है, जो भ्रष्ट आचरण से भ्रष्ट व्यवस्था को जन्म देती है। भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय-9 में भ्रष्टाचार को विस्तृत रूप में परिभाशित किया गया है। इसमें उपबन्धित धारा 161 प्रमुखत: लोक सेवकों में भ्रष्टाचार से संबंधित है, जिनकी परिधि में घूस अथवा रिष्वत और सहवर्ती अपराध, विधि विरुद्ध कार्य एवं लोक सेवकों के प्रतिरूपण संबंधी कार्य आते हैं। धारा 161 में उपबन्धित है कि वह व्यक्ति भ्रष्टाचार का दोशी माना जायेगा जो कोई लोक सेवक होते हुए या होने को प्रत्यक्ष रखते हुए वैध पारिश्रमिक से भिन्न किसी प्रकार का भी परितोशण इस बात को करने के लिए या इनाम के रूप में किसी व्यक्ति से प्रतिगृहीत या अभिप्राप्त करेगा या प्रतिगृहीत करने को सहमत होगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करने का प्रयास करेगा

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