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लोक संपत्ति को हुए नुकसान को लेकर क्या है कानून ?

 


           लोक संपत्ति को हुए नुकसान को लेकर क्या है कानून ?


लोक संपत्ति को होने वाले नुकसान के लिए संसद द्वारा वर्ष 1984 में एक कानून बनाया गया था जिसे लोक संपत्ति नुकसान निवारक अधिनियम, 1984 के रूप में जाना जाता है, इसके अंतर्गत कुल 7 धाराएँ हैं, हालाँकि हाल ही में इसमें बदलाव की मांग उठी है जिसे हम आगे समझेंगे।

यह कानून यह कहता है कि जो कोई व्यक्ति किसी लोक संपत्ति की बाबत कोई कार्य करके रिष्टि (Mischief) करेगा, उसे 5 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने के साथ दण्डित किया जायेगा [धारा 3(1)]। गौरतलब है कि इस अधिनियम के अंतर्गत 'रिष्टि' का वही अर्थ है, जो धारा 425, भारतीय दंड संहिता, 1860 में है [धारा 2 (क)]। इसके अलावा यदि कुछ विशिष्ट प्रकार की संपत्तियों के बाबत कोई व्यक्ति कोई कार्य करके रिष्टि करेगा, उसे कम से कम 6 महीने की कठोर कारावास (अधिकतम 5 वर्ष तक का कठोर कारावास) एवं जुर्माने के साथ दण्डित किया जायेगा [धारा 3 (2)]।

धारा 3 (2) के मामलों में, इन विशिष्ट संपत्तियों में निम्नलिखित संपत्तियां शामिल हैं:- (क) कोई ऐसा भवन, प्रतिष्ठान या अन्य संपत्ति, जिसका उपयोग जल, प्रकाश, शक्ति या उर्जा के उत्पादन, वितरण या प्रदाय के सम्बन्ध में किया जाता है, (ख) कोई तेल प्रतिष्ठान, (ग) कोई मॉल संकर्म, (घ) कोई कारखाना, लोक परिवहन या दूर संचार का कोई साधन या उसके सम्बन्ध में उपयोग किया जाने वाला कोई भवन, प्रतिष्ठान या अन्य संपत्ति. इसके अलावा यदि अग्नि या विस्फोटक पदार्थ द्वारा लोक संपत्ति को नुकसान कारित करने वाली रिष्टि की जाती है तो ऐसे व्यक्ति को कम से कम 1 वर्ष के कारावास (अधिकतम 10 वर्ष तक के कठोर कारावास) और जुर्माने से दण्डित किया जाएगा [धारा 4]। गौरतलब है कि इस धारा के अंतर्गत धारा 3 की उपधारा (1) एवं (2) के विषय में बात की गयी है।

लोक संपत्ति क्या है?

इस कानून में "लोक संपत्ति" का मतलब भी समझाया गया है। अधिनियम की धारा 2 (ख) के अनुसार, "लोक संपत्ति" से अभिप्रेत है, ऐसी कोई संपत्ति, चाहे वह स्थावर हो या जंगम (जिसके अंतर्गत कोई मशीनरी है), जो निम्नलिखित के स्वामित्व या कब्जे में या नियंत्रण के अधीन है :-

(i) केन्द्रीय सरकार; या

(ii) राज्य सरकार; या

(iii) स्थानीय प्राधिकारी; या

(iv) किसी केंद्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित निगम; या

(v) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में परिभाषित कंपनी; या

(vi) ऐसी संस्था, समुत्थान या उपक्रम, जिसे केन्द्रीय सरकार, सरकारी राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे:

क्या मौजूदा कानून है पर्याप्त?

सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर इस मौजूदा कानून, अर्थात लोक संपत्ति नुकसान निवारक अधिनियम, 1984 को अपर्याप्त पाया है, और इसके लिए दिशानिर्देशों के माध्यम से कानून में मौजूद कमी को दूर करने का प्रयास किया है। वर्ष 2007 में, अदालत ने "विभिन्न ऐसे उदाहरणों के बारे में संज्ञान लिया, जहां आंदोलन, बंद, हड़ताल इत्यादि, के नाम पर सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाया गया था"। दरअसल गुर्जर नेताओं द्वारा अपने समुदाय को एसटी का दर्जा देने की मांग करने के बाद, कई राज्यों में हिंसा भड़क गयी थी जिसके बाद इस कानून में बदलाव का सुझाव देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश के. टी. थॉमस और वरिष्ठ वकील फली नरीमन के नेतृत्व में 2 समितियों का गठन भी किया था।

गौरतलब है कि सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के. टी. थॉमस की अध्यक्षता वाली समिति ने जहाँ लोक संपत्ति नुकसान निवारक अधिनियम 1984 के प्रावधानों को कड़ा करने के लिए और विरोध प्रदर्शन के दौरान बर्बरता के कृत्यों के लिए नेताओं को जवाबदेह बनाने पर विचार किया, वहीँ वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस नरीमन को ऐसे बंद इत्यादि के मीडिया कवरेज को लेकर उपायों की सिफारिश करने का काम सौंपा गया था। सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के. टी. थॉमस की अध्यक्षता वाली समिति ने यह पाया कि राज्य सरकारों द्वारा 1984 के इस अधिनियम का कम ही इस्तेमाल किया जाता है, जबकि उनके द्वारा ज्यादातर भारतीय दंड संहिता, 1860 के प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाता है।

इसके बाद वर्ष 2009 में, In Re: Destruction of Public & Private Properties v State of AP and Ors (2009) 5 SCC 212. के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने 2 विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों के आधार पर दिशा-निर्देश जारी किए थे। वर्ष 2009 में आये इस मामले के बाद से, सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश (संपत्ति के विनाश के खिलाफ) यह हैं कि उस नेता/प्रमुख/आयोजक पर इस विनाश के दायित्व को स्वीकार किया जाएगा, जिसने विरोध करने का आह्वान किया था। समिति के सुझाव को स्वीकार करते हुए, अदालत ने वर्ष 2009 के इस मामले में यह कहा था कि अभियोजन को यह साबित करने की आवश्यकता होनी चाहिए कि किसी संगठन द्वारा बुलाये गए डायरेक्ट एक्शन में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा है, और आरोपी ने भी ऐसी प्रत्यक्ष कार्रवाई में भाग लिया है।

अदालत ने यह भी कहा कि दंगाइयों को नुकसान के लिए सख्ती से उत्तरदायी बनाया जाएगा, और हुए नुकसान की "क्षतिपूर्ति" करने के लिए, कंपनसेशन वसूला जाएगा। अदालत ने यह साफ़ शब्दों में कहा था कि, "जहां व्यक्ति या लोग, चाहे संयुक्त रूप से या अन्यथा, एक विरोध का हिस्सा हैं, जो हिंसक हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप निजी या सार्वजनिक/लोक संपत्ति को नुकसान होता है, तो जिन व्यक्तियों ने यह नुकसान किया है, या वे उस विरोध का हिस्सा थे या जिन्होंने इसे आयोजित किया है, उन्हें इस नुकसान के लिए कड़ाई से उत्तरदायी माना जायेगा, और इस नुकसान का आकलन सामान्य अदालतों द्वारा किया जा सकता है या अधिकार को लागू करने के लिए बनाई गई किसी विशेष प्रक्रिया द्वारा किया जा सकता है।"

दिशानिर्देशों के अनुसार, "यदि विरोध या उसके कारण, संपत्ति का एक बड़ा विनाश होता है, तो उच्च न्यायालय स्वयं से, मुकदमा चलाने की कार्रवाई शुरू कर सकता है और नुकसान की जांच करने और मुआवजा देने के लिए एक मशीनरी स्थापित कर सकता है। जहां एक से अधिक राज्यों में हिंसा हुई है, वहां सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसी कार्रवाई की जा सकती है। इस नुकसान का दायित्व, अपराध करने वाले अपराधियों पर होगा और इस तरह के विरोध के आयोजक भी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित दायित्व के अनुसार उत्तरदायी होंगे।"

इसके अलावा इस मामले में यह भी दिशानिर्देश जारी किये गए कि, प्रत्येक मामले में, उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय, जैसा भी मामला हो, हर्जाने का अनुमान लगाने और दायित्व की जांच करने के लिए एक आयुक्त या सेवानिवृत्त जिला जज को क्लेम कमिश्नर (दावा आयुक्त) के रूप में नियुक्त कर सकता है। क्लेम कमिश्नर की सहायता के लिए एक असेसर नियुक्त किया जा सकता है। नुकसान को इंगित करने और अपराधियों के साथ सांठगांठ स्थापित करने के लिए, दावा आयुक्त और अस्सिटेंट, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट से, जैसा भी मामला हो, मौजूदा वीडियो या अन्य रिकॉर्डिंग को निजी और सार्वजनिक स्रोतों से तलब करने के लिए निर्देश ले सकते हैं। इसके अलावा अनुकरणीय हर्जाना (Exemplary damages) एक सीमा तक प्रदान किया जा सकता है जो देय होने वाली क्षति की राशि के दोगुने से अधिक नहीं हो सकता है।

वर्ष 2018 में कोडूनगल्लुर फिल्म सोसाइटी बनाम भारत संघ (2018) 10 SCC 713 के मामले में अदालत ने वर्ष 2009 के मामले में जारी दिशा-निर्देशों के अतिरिक्त कुछ दिशा-निर्देश जारी किये. पुलिस को जिम्मेदारी को दिशा-निर्देशों में संकलित करते हुए अदालत ने कहा:-

A) जब हिंसा की कोई भी घटना, संपत्ति को नुकसान पहुंचाती है, तो संबंधित पुलिस अधिकारियों को प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए और वैधानिक अवधि के भीतर यथासंभव अन्वेषण पूरा करना चाहिए और उस संबंध में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए। एफआईआर दर्ज करने और पर्याप्त कारण के बिना वैधानिक अवधि के भीतर जांच करने में किसी भी विफलता को संबंधित अधिकारी की ओर से कर्तव्य के खिलाफ माना जाना चाहिए और ऐसे मामलों को सही तरीके से विभागीय कार्रवाई के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता है।

B) चूंकि नोडल अधिकारी, सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों और अन्य संपत्तियों के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए प्रत्येक जिले में समग्र जिम्मेदारी रखता है, इसीलिए उसे एफआईआर दर्ज करने और / या उस संबंध में अन्वेषण कराने में किसी भी अस्पष्ट और / या असंबद्ध देरी को, उक्त नोडल अधिकारी की ओर से निष्क्रियता का मामला माना जाएगा।

C) वीडियोग्राफी के संदर्भ में अधिकारी-प्रभारी को सर्वप्रथम, संबंधित पुलिस स्टेशन द्वारा घटनाओं को वीडियो-रिकॉर्ड करने के लिए बनाये गए स्थानीय वीडियो ऑपरेटरों के पैनल में से सदस्यों को कॉल करना चाहिए। यदि उक्त वीडियो ऑपरेटर, किसी भी कारण से घटनाओं को रिकॉर्ड करने में असमर्थ हैं या यदि प्रभारी अधिकारी की यह राय है कि पूरक जानकारी की आवश्यकता है, तो वह निजी वीडियो ऑपरेटरों से भी ऐसा करने को कह सकते हैं कि वे घटनाओं को रिकॉर्ड करें और यदि आवश्यक हो तो उक्त घटना के बारे में जानकारी के लिए मीडिया से अनुरोध करें।

D) इस तरह के अपराधों के संबंध में अन्वेषण / परीक्षण की स्थिति रिपोर्ट, इस तरह के परीक्षण (ओं) के परिणामों सहित, संबंधित राज्य पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट पर नियमित रूप से अपलोड की जाएगी।

E) किसी भी व्यक्ति (यों) को इस तरह के अपराधों के आरोपों से बरी करने की स्थिति में, नोडल अधिकारी को ऐसे अभियुक्त के खिलाफ अपील दायर करने के लिए लोक अभियोजक के साथ समन्वय करना चाहिए।

क्या है मौजूदा समस्या?

हालाँकि, चूँकि ऐसा विनाश सामूहिक भीड़ द्वारा किया जाता है, और ऐसे ज्यादातर मामलों में, कोई पहचानने योग्य नेता/आयोजक नहीं होता है। यहां तक कि उन मामलों में, जहां बड़े पैमाने पर बुलाये गए आंदोलनों में पोस्टर पर कई बड़े नाम मौजूद होते हैं, परन्तु अदालत में यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसे लोगों ने कभी भी स्पष्ट रूप से ऐसे आन्दोलन/बंद/हड़ताल को नहीं बुलाया है।

जैसा कि हमने जाना इस अधिनियम की धारा 4 के तहत, लोक संपत्ति को आग से नुकसान पहुंचाने की सजा, अधिकतम 10 साल तक की कारावास एवं जुर्माना है। लेकिन हाल के दौर में यह देखा गया है कि इस अधिनियम का इस्तेमाल न होने के कारण, यह क़ानून अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में विफल रहा है।

बंदों की संख्या में वृद्धि, उत्पीड़न, आंदोलन और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के बावजूद, अदालत में कम ही लोग दोषी करार दिए जा पाते हैं। इस तरह की घटनाओं से जुड़े सबूतों की उचित समझ न होना और अन्वेषण प्रक्रिया को उचित रूप में समझ पाने में असमर्थ अधिकारियों के कारण ऐसे मामलों में अपराधियों को दंडित करने में असमर्थता देखि गयी है।

राज्य सरकारों ने नियमित रूप से अपराधियों को बुक करने के लिए विशिष्ट कानून के बजाय भारतीय दंड संहिता के कम सख्त प्रावधानों का सहारा लिया है जोकि उचित नहीं है। जैसा कि हमने देखा कि बंद, हड़ताल या आंदोलन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्तियों या राजनीतिक संगठनों द्वारा जिस तरह से क्षति पहुंचाई जाती है, उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात पर जोर दिया है कि इस तरह के कृत्यों से संबंधित पार्टी से क्षतिपूर्ति की जाए, हालाँकि वो भी करने में सरकारें अभी तक समग्र रूप से असमर्थ रही हैं।

कोशी जैकब बनाम भारत संघ WRIT PETITION (CIVIL) NO.55 OF 2017 के मामले में, अदालत ने यह दोहराया था कि 1984 के इस कानून में बदलाव लाने की आवश्यकता है, और वास्तव में सरकार को इस कानून में बदलाव की दिशा में कदम उठाने चाहिए।

एक ताज़ा मामले में, जब उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और राज्य के अन्य हिस्सों में हाल ही में संशोधित नागरिकता अधिनियम के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन हुआ तो उसमे भी हिंसा के चलते सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति को बहुत नुकसान पहुंचा, जिसपर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह इंगित किया कि संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई के लिए तोड़-फोड़ एवं हिंसा करने वाले व्यक्तियों की संपत्ति की नीलामी की जाएगी। उम्मीद यह है कि राज्य सरकार की यह कार्यवाही, सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अंतर्गत, उचित रूप से अंजाम दी जाएगी, जिससे इन दिशा-निर्देशों का पालन करने की देश में एक बेहतर शुरुआत हो सके।

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